रामगढ़ बांध

दिल्ली में 1982 में एशियाई खेलों में नौकायन प्रतियोगिता जयपुर के भव्य कहे जाने वाले रामगढ़ बांध में आयोजित हुई थी। यह कल्पना कितनी खतरनाक और भयावह है कि उस प्रतियोगिता में भाग लेने वाले देश-विदेश के नौकायन प्रतियोगी यदि अब इस बांध को देखें तो उन्हें अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं होगा कि जिस लबालब भरे बांध मे उन्होंने अपनी नौकाएं दौड़ाई थीं, अब वहां केवल जंगली झाडियां ही दूर तलक तक दिखाई पड़ती हैं।

तीस लाख की आबादी को पानी पहुंचाने वाला एक बांध देखते ही देखते एक विराने में तब्दील हो गया। राजस्थान में जल संचय करने का यह एक बेजोड़ उदाहरण था। जिसे लगभग सवा सौ साल पहले बनवाया गया था। जोधपुर से रामगढ़ बांध देखने आए अधेड़ महेंद्र सिंह कहते हैं कि क्या इसी का लेकर मेरे रिश्तेदार इतना इतराते थे कि जितना बड़ा तुम्हारा शहर नहीं है, उससे बड़ा तो हमारा रामगढ़ बांध है।

वह कहते हैं कि मुझे जवानी में तो यहां आने का मौका नहीं मिला और जब ढलती उम्र में यहां आया हूं तो यह भी बांध पूरी तरह से खत्म हो चुका है। सहसा एक नजर में यह विश्वास करना बहुत कठिन है कि यह वही बांध है जहां से पूरे जयपुरवासी अपनी प्यास बुझाते थे।

रामगढ़ बांध के पास रहने वाला एक आदमी बताता हैं कि एक समय हमारी आजीविका का साधन ही यह दुकान थी, अब तो इस दुकान के दम पर मेरे जैसे अधेड़ का भी पेट नहीं भरता। कारण है कि अब तो यहां कोई आता-जाता ही नहीं है। बस सड़क है तो इस पर आने जाने इक्का दुक्का राहगीर कभी-कभार रूक कर कुछ खरीददारी कर लेते हैं।

सचमुच में यह बांध अब वीराने में सिमट कर रह गया है। दूर-दूर तक सन्नाटा पसरा हुआ है। इस सन्नाटे को टूटे-फूटे पानी स्प्लाई करने वाले कार्यालय के टीन शेड पर इधर-उधर उछल कूद करने वाले बंदर की धमक अवश्य इसे यदाकदा तोड़ती है। अन्यथा यहां बांध अपने बीते सुनहरे कल की बस यादें ही समेटे हुए है। बांध की जंग लगी पाइप लाइनें हों या बंद पड़े मोटर के हैंडल या यहां-वहां दूर तक गिरीपड़ी बांध की दीवारें हों। यह बांध के खत्म होने की कहानी बयां कर रहा है। हालांकि इसके बावजूद बांध की दीवारों पर बने गुंबद अब भी शान से खड़े हैं और भूले-भटके आने वालों को अपने भव्य अतीत को दर्शा रहा है।

जयपुर घूमने आने वाले बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक सवा सौ साल पुराने इस परंपरागत बांध को अवश्य देखने आते थे। राजस्थान में जल संचय करने की परंपरा की एक लंबी फेहरिस्त है। उसमें सूची में यह बांध भी शामिल था। लेकिन जयपुर शहर के महानगर में बदलते ही इस बांध के कैचमेंट क्षेत्र की जमीनों पर लोगों द्वारा कब्जा करना शुरू कर दिया। यह कब्जा इतना अधिक हो गया है कि इस बांध में चार नदियों से आने वाला पानी ही बंद हो गया।

अतिक्रमणकारियों ने कुछ इस प्रकार से कब्जा किया कि इस बांध का जल स्त्रोत को ही रोक दिया। और नतीजा सामने है एक सूनसान पड़ी खाली जगह। दूर-दूर तक बस जंगली झाडियां ही दिखाई पड़ रही हैं। कहीं दूर तलक भी पानी की एक झलक तक नहीं दिखाई दे रही है। राजस्थान की राजधानी जयुपर से लगभग 32 किलोमीटर दूर स्थित रामगढ़ बांध में अब पिछले एक डेढ़ दशक से कोई पर्यटक नहीं जाता है।

इस संबंध में जयपुर में विदेशी पर्यटकों को पिछले पांच सालों से राजस्थान की सैर कराने वाले टैक्सी ड्राइवर अखिलेश बताते हैं कि अब भी हर विदेशी की घूमने वाली जगहों में एक जगह निश्चित ही रामगढ़ बांध होती है। लेकिन हम ही उन्हें बता देते हैं कि अब वहां कुछ नहीं है। यह बांध 15.5 वर्ग किलोमीर में फैला हुआ है। एशियाई खेलों के आयोजन के 39 साल बाद इस बांध में पानी का एक बूंद नहीं है।

जयपुर  से सटे रामगढ़ बांध का गुबंद। फोटो: महेंद्र कुमार

चालीस सालों में सवा सौ साल पुराना बांध खत्म हो गया। उसे जमीन खा गई या आसमान खा गया, अब यह यक्ष प्रश्न नहीं है क्यों कि इस प्रश्न का जवाब हर जयपुरवासी और सरकार के पास है। पूरे बांध पर अतिक्रमणकारियों का कब्जा हो चुका। इस कब्जे को न तो अब तक सरकार हटा पाई है और न हीं अदालत। 

✍️Ds ghunawat

रेगिस्तान का जहाज

मानो ऊंट यू कह रहा हो कि हे मानव रेगिस्तान की धरा पर मैंने हर विकट परिस्थिति में तेरा साथ दिया पानी की सप्लाई, आवागमन का साधन ,हल जोतना, मनोरंजन, सवारी, दूध ,तथा पानी की समस्या को देखते हुए सात सात दिन बिन पानी के भी मैंने तेरा साथ दिया
हे मानव अब तुम्हे मेरी जरूरत नहीं रही तो मुझे दर-दर भटकने के लिए घर से निकाल दिया मै तुझ बिन कैसे जिऊंगा मेरी पीढी ही समाप्त हो जाएगी।।
आगे भविष्य में तुम्हारी अगली पीढ़ी को में चिड़ियाघर में नजर आऊंगा ।।
ऊंट, आंखों में आँसुओ के साथ है मानो बोल रहा है कि विदा बच्चे मैं जा रहा हूँ ।।
जोहार 🌱🌾

बैलगाड़ी

आज से लगभग 40या 50साल पहले ऊंट गाड़ी का चलन प्रारंभ हुआ  था , तो उससे पहले  हमारे गाँवो में आवागमन व आदिकिसान के लिए कृषि कार्य के लिए एक मात्र साधन बैलगाड़ी हुआ करता था
बैलगाड़ी से जुड़ी हुई कहानियां और कहावते हमारे जनमानस में समाई हुई है लेकिन प्रत्यक्ष रूप से बहुत ही
कम भाइयो ने देखी होगी , सवारी तो खैर दूर की बात ?
बैलगाड़ी वाला दौर तो लगभग आज से लगभग 25 साल पहले  ही खत्म हो  गया ,,लेकिन अब तो ऊँट गाड़ी वाला दौर भी खत्म है
आज भले ही मानव ने बहुत विकास किया है, और एक से एक बेहतरीन तथा तेज चाल वाली गाड़ियाँ आदि बनाई हैं, लेकिन बैलगाड़ी के महत्त्व को नहीं नकारा जा सकता। प्राचीन भारतीय परिवहन की रीढ़  रही
वर्तमान समय में भले ही मानव तेजी से विकास पथ पर अग्रसर है, जो काबिल-ए-तारीफ़ भी है, पर सृष्टि के गूढ़ रहस्यों की खोज में हम कहीं न कहीं अपनी प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं हमने पुरी तरह भारतीय परिवहन व्यवस्था की रीढ़ रही बैलगाड़ी को लगभग खो दिया है। आज जो भी मनुष्य पचास से अधिक वर्ष के हैं, वे जानते हैं कि बैलगाड़ी हांकना और घोड़े की लगाम थामने में वही अन्तर था, जो आज कार व बस को चलाने में है। यही नहीं चूंकि उनके अन्दर भी आत्मा थी।।
जोहार 
✍️Ds घुनावत

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माँ😘

हो जाऊं कितना भी ऊंचा

पर मां के चरणों की रज हूं ।।

दुनिया मुझको कुछ भी माने

मै तो मां का सूरज हूं।।

कभी भानु कह देती कुल का कभी लाल कह देती है ।

कभी बीठाती गोद में अपनी

और निहाल कर देती है

मां के स्नेह सरोवर का ।।

मै एक प्यारा सा पंकज हूंमै तो मां का सूरज हूं।।

✍️Dsghunawat

जोहार प्रकृति माँ🌱🌾

प्रकृति टूटी हुई चीज़ों का इस्तेमाल बड़ी खूबसूरती से करता है, बादल  के टूटने पर पानी बरसता है, मिट्टी टूटने पर खेत बनता है और बीज के टूटने पर नए पौधे की संरचना होती है। इसलिए जब आप खुद को टूटा हुआ महसूस करो तो समझ लीजिये प्रकृति आपका इस्तेमाल किसी बड़ी उपियोगिता के लिए करना चाहती है जोहार प्रकृति माँ 🌾🌱

माँ के संग बचपन

मन करता है लौट चलें गांव

की ओर छोटी सी पगडंडी से

खुले खुले खेतों में। तोड़ लू कुछ हरे हरे पत्ते

पीले पीले फूल ।फिर  प्यारा सा गुलदस्ता बना लू सीधे काका, ताऊ के हाथों में थमाऊ,और कह दू, क्या खूब सजाया है धरा को मन करता है

उस बचपन में लौट जाऊं जहां मिलती थी गाँव की महिलाएं,  ग्राम बालाएं।

घर से कुएँ तक झुण्ड में। माथे पे, किसी के हाथ में ,बासण हुआ करते थे।

वो डगर सुहानी लगती थी जब मै जीजी के पीछे पीछे चलता था मन करता है ….लौट चले गाँव की औऱ

✍️Dsghunawat
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में मेरी माँ की आत्मकथा हु

बूढ़ी हो चली माँ..अक्सर अपनी चीजें और बातें भूल जाती है..पर, उसे आज भी याद है..
मेरा रोना, हँसना..मेरा घुटनों पे चलनामेरी तोतली बातें..मेरे चोटों के निशान के पीछे की कहानी..मेरी सारी शरारतें..वो मुझे आज भी सबकुछ बताती है..माँ, मुझे आज भी मेरा बचपन  दिखाती है ✍️Dsghunawat

✍️Dsghunawat

8741980870

दादा जी के साथ बचपन

बचपन की यादे🌾🌱


खैर इनमे वो असीम आंनद की अनुभूति कहा पैदा होती है जो दादा के पास सोने में थी । उनके साथ बैठ के सुण कातने में , उनके साथ डेरा घुमाने में, और गर्मी के दिनों में एक दो मोगरी मुझ कूटने में थी ।
रात का वक्त था , खुले आसमान में दादा के पास लेटा हुआ था, मेरे को दादा जी ने सीने से लगाया हुआ था , दादा मुस्कुरा रहा था , हाथ में गमछा लहरा रहा था ।
मजाल है कोई मच्छर आवाज़ भी कर जाए ।
तारे बता रहे थे , शर्त लगी थी दादा कब तक सोयँगे ।
बादल निकलने पर , तारे ढूक कर देख रहे थे कहीं सो तो नहीं गया , चाँद, तारो की शर्त पर मुस्कुरा रहा था , और अपनी गति से रात को भी खींच रहा था।
गमछा रात भर हिलता रहा ,
तारे झगड़ते रहे
दादा सोया या नहीं सोया ❤️ लेकिन मेरे को चैन की नींद में सुलाया
जोहार दादा जी 🌱🌾






	

दादा जी के साथ बचपन

मेरे दादाजी मेरे जीवन के गाथक रहे है.और तीसरा पोता हु उनके हृदय के सबसे ज्यादा करीब रहा हूँ,,। वो अपने जीवन मे मुझे इतना स्नेह और प्रेम दिये है कि उसका माप या वर्णन करना मेरे बस की नही..। मेरे दादाजी के सबसे ख़ास बात ये थी जितना ज्यादा वो हमपे गुस्सा करते थे..।
उससे कई लाख गुना वो हमसे स्नेह करते थे…। ऐसा कह लो कि हम सब भाई बहिन उनके “जिगर के टुकडे” थे।। उनसे ही तो मैं सीखा हूँ.. घर के कर्तव्य और ज़िम्मेदारी  क्या होती है..। उनसे ही तो सीखा हूँ.. बुरे वक्त में अपनों को कैसे सम्भाल के रखना होता है। उनसे ही तो सीखा हूँ,
प्रेम और स्नेह का सागर में कैसे जीवन व्यतीत करना है,। मेरे दादाजी हमेसा से मेरे जीवन के प्रेरणार्थक और हौसलामंद इंसान रहे है,। और फिर मेरे दादाजी की उम्र ढ़लती गयी और आज वो  इस दुनिया मे नही है प्रकृति ने 2014 में उन्हें अपने घर बुला लिया ।।आज भी मेरे को किसी भी मेरे आसपास का अतीत का इतिहास जाने की जिज्ञासा होती है तो बहुत याद आते हो ।।

आप जहा भी हो ,आपको प्रकृति आपको हमेशा खुश रखे ।।

Miss you always 😢

दादा जी के साथ बचपन