दूर शहर में हम आये

पढ़ने दूर शहर में आये,
घर को छोड़ भंवर में आये,
खुली बाखर में रहने वाले,
पेड़ों की छांव में सोने वाले,
छोड़ खेत और खलिहान को,
बापू के बाग़बान को,
माँ के हाथ के मक्के- बाजरे की रोटी,
छोड़ के भर्ता – बाटी मोटी,
निर्मल जल और खुली हवा को,
मां के आंचल की नींद – दवा को,
चार चवन्नी के चक्कर में,
छोड़ स्वर्ग हम नरक में आये,
पढ़ने दूर शहर में आये…!!

✍️Mr. घुणावत

रूप ऐ-भगतसिंह- टिकैत

बनकर आया था रहनुमा आज निशाने पर हूँ
गोली हो या लाठी खुद को आजमाने पर हूँ

रखोगे गर ज़ुबाँ ख़ामोश नस्लें गूंगी होंगी फिर
सीने से तुम्हारे बुज़दिली तमाम मिटाने पर हूँ

थाम सको तो थाम लो हाथ एक दूसरे के तुम
हुकूमत के ज़ुल्म को मैं साबित झुकाने पर हूँ

बनकर जिओगे कब तक कठपुतली गैरो की
शक़्ल हकीकतन तुम्हारी आज दिखाने पर हूँ

ग़ुलामी से बचना है गर आवाज़ बुलंद करो
दहकां मैं तेरे लिए खुदको ज़िन्दा कफ़नाने पर हूँ

“”टिकैत”” का लिए लक़ब मैं यू ही नही फिरता
हर शय अपनी दहकां तेरे लिए मैं मिटाने पर हूँ

साथ गर दे सको मेरा तो बाहर निकलो घरों से

घुणावत की कलम के सहारे मजबूर बुलाने पर हूँ

✍️घुणावत

आधुनिकता की चकाचौंध में माँ बाप के प्यार को खोती युवा पीढ़ी

एक वक्त ऐसा आयेगा की हम सब अपने अपने माँ पिता जी को भी खो देंगे,वो हमे काबिल बना कर इस दुनिया से किसी दूसरी दुनिया मे चले जायेंगे,विडंबना देखिये की बहुत से ऐसे लोग आज भी मौजूद हैं जो माँ पिता जी के डाँट फटकार को दिल से लगा कर उनसे कई महिनों तक बात चीत बंद कर देते हैं, कभी उनके पिता जी दुश्मन दिखते हैं तो कभी उनकी मां उनको पागल दिखती हैं और इन सब के बीच वो इंसान खुद को महान समझता है और अपने हीं माता पिता से दूरियाँ बनाने लगता है,अंजाने मे वो एक गलती कर बैठता है खूद् को खुश करने के प्रयास मे वो अपने माँ पिता जी के दिल को ना जाने कितनी बार ठेस पहुंचाता है,धीरे – धीरे उनके चेहरे से भी नफ़रत करने लगता है वो युवक अहंकार , जिद्द , लालच , काम और आधुनिकता उसके भीतर अब इतनी ज्यादा घर कर जाती है की उसके सामने उसके माँ पिता जी के प्यार, दुलार, डाँटना, समझाना सब धूमिल हो जाता है और वो इंसान चकाचौंध के बीच अंजाने मे हीं अकेला हो जाता है। कुछ सालों बाद युवक माँ पिता जी से दूर किसी शहर मे ऐसो आराम से रहने लगता है जैसे उसका मूल कर्तव्य शहर मे रहना हीं हो,इधर माँ पिता जी, गाँव मे बच्चों के वियोग मे दुनिया से अलविदा कह जाते हैं । बच्चों को इसकी भनक उनके जवानी मे पता तक नही चलती और जैसे हीं उनके बच्चे भी ठीक वैसा हीं करने लगते हैं तब उनके पास पछतावे के बजाय कुछ भी नही बचता । माँ पिता जी का हाय लगते लगते वो भी दुनिया से बाय बोल देता है।
तो मेरे मित्रों ,जो भी पल मिला है आपको अपने माँ पिता जी के साथ उन्हें जी भर के हँसी खुशी के साथ जियें। माँ पिता जी भी जानकारी के अभाव मे कभी कभी गलत हो सकते हैं, तो उस वक्त उन्हें समझाइये ना की उनसे दूर हो जाइये । क्योंकि ये जो आपके दिमाग़ मे जो कुछ भी भरा पड़ा है वो उनके संपूर्ण जीवन की मेहनत की कमाई है। ध्यान रहे जब भी किसी बुरी परिस्थिति मे फसियेगा तो अपने माँ पिता जी से बातों को शेयर जरूर करें, अगर कुछ नही तो उस जंजाल से लड़ने की हिम्मत जरूर मिलेगी ।।
❤️❤️❤️

26/11 आतंकी हमला

भारत कैसे भूल सकता है, इस आतंकी हमले को,
जब हमारी माया नगरी मुंबई, हो गई थी लहूलुहान।
अफरातफरी का माहौल बन गया था पूरे देश में तब,
सैकड़ों निर्दोष निहत्थे लोगों की चली गई थी जान।
भारत कैसे भूल सकता…

प्रतिरक्षा में पुलिस और सेना के जवान भी शहीद हुए थे,
साथ ही कुर्बान हुए थे हमारे कुछ विदेशी मेहमान।
चार दिनों तक आतंकियों से मुकाबला चला था जमकर,
जैसे दो देशों के बीच में, कोई युद्ध हो घमासान।
भारत कैसे भूल सकता…

आमीर अजमल कसाब नाम का आतंकी जिंदा पकड़ा,
सारे राज खोले उसने, जानकर विश्व हो गया हैरान।
सारे सबूत देने के बाद भी, हमारे पड़ोसी ने बात नहीं मानी,
आतंकवाद पर देता रहा है हमेशा, उल्टा सीधा बयान।
भारत कैसे भूल सकता…………..

पड़ोसी दुश्मन देश की औकात नहीं, सामने आने की कभी,
शुरू से ही छुप छुपकर, करता रहता है वह भारत को परेशान।
नया भारत अब मुंहतोड़ जवाब देता अपने दुश्मनों को,
हाथ खुले हुए हैं, शान से बदला लेते हैं अब हमारे जवान।
भारत कैसे भूल सकता…पाकिस्तान तेरे किये को 😢

Photo of Google

✍️Ds घुणावत

समाज की नजर में स्री

स्त्री को सेक्स की स्वतंत्रता नहीं। पुरुष को है। माना जाता है, पुरुष का एक से अधिक स्त्री के साथ सोना बड़ी बात नहीं मानी जाती। वही, स्त्री अगर एक से अधिक पुरुष के साथ प्रेम या सेक्स कर ले तो उस पर ‘बदचलन’ का ठप्पा लगा दिया जाता हैं यह समाज अपनी सोच में न कभी बदला था न बदलेगा

पोर्न फिल्मों में अपने सेक्स को प्रदर्शित करती स्त्री मुझे बेबाक लगती है। हो सकता है आपके लिए वो स्त्री नीच और गंदी हो मगर मैं उसे इज्जत देता हूं। वो अपने सेक्स अपनी काम-भावना को छिपाती नहीं। वो पुरुष को आजमाती है कि कौन कितने मिनट या घण्टे तक उसके साथ टिके रह सकता है।

कहते सुनता हूं, ‘टच वुड’। यह भी यह प्रकार का अंधविश्वास है। क्या ‘टच वुड’ कह देने या ‘फिंगर क्रोसड’ करने भर से आई बला टल जाएगी? मुझे लगता है, समाज का बड़ा पढ़ा-लिखा वर्ग अधिक अंधविश्वासी है। ये अपने दिमाग से कम जज्बातों से काम ज्यादा लेता है। हर चीज में शगुन-अपशुन खोजता है।

Ds घुणावत

समझदारों से मैंने खुद को बचाए रखा है। समझदारों के साथ सबसे बड़ी समस्या यही होती है कि वे समझदार होते हैं। दूसरों को मूर्ख खुद को अक्लमंद समझते हैं। दुनिया समझदारों से भरी पड़ी है- ऐसा समझदारों का मानना है। जिनके पास समझ होती है, उनके पास प्रतिरोध करने की क्षमता नहीं होती।

जिस्म की माँग

लड़के ने नम्बर मांगा आप ने दे दिया…
लड़के ने तस्वीर मांगी आप ने दे दी…
लड़के ने वीडियो कॉल के लिए कहा आप ने कर ली…
लड़के ने दुपट्टा हटाने को कहा आप ने हटा दिया…
लड़के ने कुछ देखने की ख्वाहिश की आप ने पूरी कर दी…
लड़के ने मिलने को कहा आप माँ बाप को धोखा देकर आशिक़ से मिलने पहुंच गयीं…
लड़के ने बाग में बैठ कर आप की तारीफ़ करते हुए आपको सरसब्ज़ बाग दिखाए आपने देख लिये…
फिर जूस कार्नर पर जूस पीते वक़्त लड़के ने हाथ लगाया, इशारे किये, मगर कोई बात नहीं अब नया ज़माना है यह सब तो चलता ही है…
फिर लड़के ने होटल में कमरा लेने की बात की, आप ने शर्माते हुए इंकार कर दिया, कि शादी से पहले यह सब अच्छा तो नहीं लगता न…
फिर दो तीन बार कहने पर आप तैयार हो गयीं होटल के कमरे में जाने के लिए…
आप दोनों ने मिल कर खूब एंजॉय किया…
अंडरस्टेंडिंग के नाम पर दुल्हा दुल्हन बन गए बस बच्चा पैदा न हो इस पर ध्यान दिया…
फिर एक दिन झगड़ा हुआ और सब खत्म क्योंकि हराम रिश्तों का अंजाम कुछ ऐसा ही होता है…
लेकिन लेकिन…
यहां सरासर मर्द गलत नहीं है, वह भेड़िया है, वह मुजरिम है, वह सबकुछ है…
क्योंकि आप ने तो तस्वीर नहीं दी थी वह जबर्दस्ती आपके मोबाइल में घुस कर ले गया था…
आप ने तो अपना नम्बर नहीं दिया वह लड़का खुद आप के मोबाइल से नम्बर ले गया था…
आप ने तो वीडियो कॉल नहीं की वह लड़का खुद आप के घर पहुंच गया था आपको लाइव देखने…
जूस कार्नर पर भी जबरदस्ती ले गया था गन प्वाइंट पर…
होटल के कमरे तक भी वह आपको जबर्दस्ती आपके घर से ले गया था…
तो मुजरिम तो सिर्फ लड़का है आप तो बिल्कुल भी नहीं…
बच्ची हैं आप कोई चार साल की?
आपको समझ नहीं आती?
यह कचरे में पड़ी लाशें देख कर भी आपको अक़्ल नहीं आती?
यह बिना सर के मिलने वाले धड़ आपकी अक़्ल पर कोई चोट नहीं देते?
यह सोशल मीडिया पर आए दिन ज़्यादती के बढ़ती हुई घटना आपको कुछ नहीं बताती?
जूस कार्नर पर जाना, अपनी नंगी तस्वीर किसी गैर आदमी या लड़के को देना…
आपको नहीं पता था कि एक होटल के कमरे में या चारदीवारी में जिस्मों की प्यास बुझाई जाती है,
सब पता था आपको, सब पता है आपको…
होटल के कमरे में मुहब्बत के अफसाने नहीं लिखे जाते,वहां कोई इबादत नही होती है
फिर शिकायत होती है के चार लड़कों ने ग्रुप रेप कर दिया…
क्या लगता है वह आपका जो आपकी इज्ज़त का ख्याल रखे जो खुद आपको इसी मकसद के लिए लेकर जा रहा है?
अपनी सीमा में रहेंगी तो आपको कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता…
जिस्म के भूखो से दूर ही रहे लड़का हो या लड़की प्यार जैसे पवित्र रिश्ते को बदनाम ना करे प्यार दिल देखकर करे ना कि जिस्म देखकर l
जब तक तुम साथ नही दोगी तब तक किसी लड़के की कोई औकात नही हैं कि वो तुम्हे किसी होटल के रूम तक ले जा सके। गलत लगे तो मुझे माफ कीजिएगा !

ह्रदय दिवस

विश्व हृदय दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं…….

हृदय से हृदय का मेल घट रहा है ।
अंदर ही अंदर बेचैनियां बढ़ रही है।।

कितना भी तू कर ले उपाय।
दिलों से दिलों को मिलाने वाले काम करने होंगे।।

माना कि समय बदल गया है।
लेकिन दिल तो अभी वही है।।

कितना भी तू कर ले उपाय।
अपनों को अपने से बात करनी होगी ।।

कुछ अपने दिल की।
कुछ उसके दिल की भी बात करनी होगी ।।

हम संपन्नता में बढ़ रहे हैं।
लेकिन दिल से हम गरीब होते जा रहे हैं।।

घुणावत!तू इतना क्यों बेचैन हो रहा है। इसलिए तो हम विश्व हृदय दिवस मना रहे हैं ।।

✍️Ds घुणावत

ढलती उम्र की मजबूरिया

साला घर की तरफ से वापिस शहर को आती ट्रेनों को देख बहुत कष्ट होता है.. दरअसल उसमें भी कोई मुझसा लड़का अपने सपने आँखों में गंठियाए शहर आ रहा होता है, या फिर कोई लड़की सारी बेड़ियाँ तोड़ कर शहर आ रही होती है, जो जानता है वो ये की कोई बाप अपने बच्चों को इस आसरे पे छोड़ शहर में नौकरी की तलाश में आता है कि, जब वहां से वापस आएंगे तो बढ़िया बढ़िया कपडे और मिठाई ले आएंगे, ये सबसे ज्यादा सालता है. कि कैसे कोई अपना खेत अपना गाँव अपना घर छोड़ कर रह लेता है ? लगभग 10 साल होने को आ रहे घर छोड़े लेकिन आज तक यह चीज़ दिमाग में कौंधती है तो शिराहने पर  कुछ सिसकियों के अलावा कुछ नहीं मिलता…

यार मुझे इस शहरीकरण से बहुत नफरत है, मतलब अगर अर्बनाइज़ेशन हो सकता है तो रूरलाइजेशन क्यों नहीं ? रोजगार या शिक्षा गाँव में क्यों नहीं मिल सकती, ये शहरों में बने कॉलेज क्या जाने की आँसू के कितने घूँट पीकर हम यहाँ आते हैं, मन अबोध बालक सा, रोने को होता है तो दिमाग के ही किसी कोने से एक मर्दाना आवाज़ आती है, शांत रहो,अब तुम बड़े हो गए हो, रोओ मत, कोई नौकरी की तलाश में बिन बरसाए  गेंहूँ तो कोई बीमार पत्नी या नन्हें घुटनों के बल रेंगते बच्चों को छोड़ कर चला आता है, क्यों ? क्योंकि गाँवों में रोज़गार नहीं है…

वैसे शहरों में आवारा भीड़ में गुम होना शायद फ़ैशन हो, मगर मुझे तो वही गाँव के एकांत में पुरा सुकूँ आता हैं. ट्रेनों में भूस्से की तरह लदे-फने लोग शहरों में आ जाते हैं, कुछ लड़के जिनके आँखों में कुछ कर गुजरने की आशाएं प्रतिबिंबित होती हैं, कुछ लडकियां, जो रूढ़िबद्धता स्टिरियोटाइप्स को तोड़ना चाहती हैं, कुछभी कर के उन्हें इस शहर का पूर्ण दोहन करते हुए सफल होना है, मगर सफल होने के पैमाने निश्चित कौन करेगा? आप एक तरफ़ एक शान-ओ-शौकत वाली नौकरी तो पा जाते हैं, पर गाँव से हाथ धो बैठते हैं, अपनी नींव से हट जाते हैं, भटक जाते हैं,गाँव मे दूध राबड़ी , दलिया खाने वाले लोग मैंगोशेक, कोल्ड काफी पीते हैं तो दुःख होता है. छांछ पीने वाले लोग, अमूल या सरस डेयरी के प्लास्टिकों में बंद पास्चुरिकृत छांछ पीते हैं तो दुःख होता है. दाल बाटी न मिलने पर दुःख होता है, एक गुच्ची अरमानी पेपे रेंगलेर जीन्स पहन कर चलते हुए लोग जब आपको घूरें तो दुःख होता है, इस गुलाबी नगर में अपनी खड़ी बोली में बतलाते हुए किसी को सुने और मुंह बिदकाये तो दुःख होता है, वो गूची अरमानी , नाइक एडिडास वाले लड़के, जब बिना एक्सक्यूज मी बोले धक्का देकर चले जाएं और आप चाह कर उनको कुछ कह  न पाएं तो दुःख होता है…

और दुःख होता है जब रोज के रोज उतने ही लोग ट्रेनों में लदे-फने शहर को आएं जितने कल आये थे, आप चाह कर भी उनको रोक नहीं सकते, क्योंकि आपके भी हाथ इसी रंग से रंगे हुए हैं! दुःख होता है, जब माँ फोन और करती है और कहती है बेटा जल्दी नौकरी लेकर घर आ जाओ, तब दुःख होता है जब पिताजी , चाचाजी की बातें सुनते सुनते आप कुछ बोल नहीं पाते, आपका गला रूंध जाता है, और दुःख होता है जब राखी पर बहनें राखी कुरियर से भेजती हैं, दुःख होता है जब होली दिवाली दशहरा गुप्प अँधेरे कमरे में सूखी रोटी  खाकर बिताना पड़े, जब जन्मदिन याद न रहे, या याद भी रहे तो होश न रहे कुछ करने का, आप दूजे नशे में धुत हो, आपको नौकरी चाहिए, ये सब होते हुए देखना, समझना, और कुछ कर न पाने पर दुःख होता है, सब सहते हुए आपके रो न पाने पर दुःख होता है, और साला इतना दुःख होता है कि सिर्फ दुःख ही दुःख नज़र आता है.. यार रोज़ के रोज़ उन ट्रेनों को गाँवों की तरफ से शहर वापस नहीं आना चाहिए.. उनको वापस आते देखते हुए दुःख होता है…

**बेरोजगारी**

भटकाव की राह पर मेरे गाँव के युवा साथी

हर व्यक्ति का समाज, परिवार, दोस्तों व अपने काम के प्रति कुछ न कुछ दायित्व होता है। इसे निभाने के लिए हमें गंभीर भी होना चाहिए। हमें अपने दायित्व को निभाने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए। इन सभी दायित्वों में गाँव के प्रति कुछ करना, हमारा प्रमुख दायित्व है। हमें किसी न किसी रूप में इसे पूरा भी करना चाहिए। गाँव मे जरूरतमंदों की मदद, युवाओं। को नैतिक शिक्षा देना । युवा पीढ़ी को संस्कारवान बनाना, आज के युवा आधुनिकता के रंग में अपने संस्कारों, नैतिकता और बड़ो का आदर करना भूल रही है
अपनी सकारात्मक ऊर्जा को कही भी काम नही ले रहे हैं
वर्तमान में युवा वर्ग में जितना अधिक भटकाव दिखाई दे रहा है जो शायद ही पहले कभी उसमें था । युवा  वर्ग के दिग्भ्रमित होने का अर्थ है कि युवा वर्ग का अपने मूल उद्‌देश्यों, नैतिक कर्तव्यों तथा उचित मार्ग से विमुख होकर अनुचित उद्‌देश्यों की प्राप्ति हेतु अवांछित कार्यों का आश्रय लेते हुए गलत मार्ग पर कदम बढ़ाने लगना । सही दिशा की ओर बढ़ने की अपेक्षा अनेक गलत दिशाओं की ओर  उन्मुख होना ।
आज की ढलती शाम को में गाँव के युवाओं के साथ बैठा हुआ था , आजकल के युवाओं के पास बातचीत क्या क्या होती है मेरे को किसी की बातो में भी सकारात्मकता नजर नही आयी। सब कुछ अनर्गल था
आजकल कल के युवाओं के पास इन बातचीतों के अलावा कोई बातचीत नही होती ,मेरे पास रैंगलर ,नाइक कंपनी का पेण्ट शर्ट है ,मेरे पास गुच्ची रीबॉक के जूते है , मेरे दोस्त के पास डिजायर गाड़ी है , वो इतने रुपया खर्च करता है , वो अलग फ्लेट लेके रहता है वो ऐप्पल का फ़ोन रखता है उसके इतनी महिला मित्र हैं । फिर बीच बीच मे तानसेन , मामा सिगरेट आजाती है वो इतनी सिगरेट पी जाता है ,इतनी तानसेन खा जाता है , ये इतनी सिगरेट पी जाता है ।
चाहे दूसरे के रुपयो से ही मामा , तानसेन खाएंगे पर बात लाखो करोडो से कम नही करेंगे
हमारी युवा पीढ़ी भटकाव के मार्ग पर अग्रसर क्यों होती जा रही है सभी साथी अपने अपने विचार प्रकट करे
धन्यवाद

युवाओं की ढलती जवानी बिलखते सपने

गांवो की लगभग पूरी की पूरी युवा आबादी, घोर पागलपंथी की गिरफ्त में है। पढ़ाई -लिखाई से नाता टूट चुका है। देश-दुनिया की कुल समझ व्हाट्सएप से बनी है। वहां पाकिस्तान माफ़ी मांगता है और चीन थरथर कांपता है।, कोंग्रेस ऐसी बीजेपी ऐसी इन सब उलझन से बाहर निकलने तक का प्रयास नहीं करते l दहेज में बाइक मिली है, भले ही तेल महंगा हैं, सरसों-गेंहू बेच, एक लीटर भरा ही लेते हैं और गांव में एक बार तो फड़फड़ा लेते ही है। चुनावी+पाखंडी माफिया उनका इस्तेमाल करते हैं। उन्हें आखेट कर किसी न किसी धार्मिक सेनाओं या अपने गुटों के पदाधिकारी बना कर, अपनी गिरफ्त में रखते हैं। हमारे आसपास भी ऐसा टोला है वहां से शोशल मीडिया पर अक्सर कुछ युवाओं के फ्रेंड रिक्वेस्ट आते हैं। उनकी हिस्ट्री देखिए तो सिर पर रंगीन कपड़ा बांधे , जयकारा लगाते, गुटों में फ़ोटोशूट, दूसरे की बोलेरो पर केक काटते हुए फोटो मिलेगी। यह है नई पीढ़ी! इसी पर है देश का भविष्य। एक बीमार समाज,ऐसी पीढ़ी अपने बच्चों को कहां ले जा रही?जमीन-जायदाद इतनी नहीं कि ठीक से घर चला सकें और वैसे जमीन ज्यादाद को करने के लिए पानी भी नही रहा जो बीमारी का ईलाज हो सके। तो इनके लिए बेहतर जीवन क्या है? ये पीढियां अब उबरने वाली नहीं। दास बनने को अभिशप्त हैं ये। इनको।डांटने वाला व्यक्ति सबसे ज्यादा बुरा लगता हैं ।घमण्ड इतना कि IAS , PCS PSU तो उनकी जेब में होते हैं। एक अपाहिज बाप के जवान बेटे को दिनभर चिलम और नशा करते देख कर कोई टोक भी दे तो उसकी मां बोलती हैं कि हमारा बेटा कुछ भी करें तुम्हारे घर का क्या खाता है
अब ऐसे मर रहे समाज में जान फूंकना आसान काम नहीं है? शिक्षा बिन, बातों का असर नहीं हो सकता। अब सवाल उठता है कि जिस समाज को सचेतन ढंग से बर्बाद किया गया हो, शिक्षा से वंचित किया गया हो तो यह सचेतन गुलाम बनाने का कृत्य है। यह अमानवीय भी है और शातिराना भी। गुलाम बाहुल्य समाज, दुनियाभर में निम्न ही रहेगा, बेशक कुछ की कुंठाएं तृप्त हों। फिलहाल ये उबरने से रहे,,, और जब तक तुम whatsapp ज्ञान जैसी बातों को शेयर करना नहीं छोड़ देते तब तक तुम कुछ नया नहीं कर सकते

धन्यवाद ।।

✍️~Ds घुणावत~

धोनी युग

सदी का एक तूफान कितनी शांति से थमा. लोग उस पर बहस कर के व्यूज बढ़ाते रहे. सहवाग-गम्भीर आ आ के बताते रहे कि दो विदाई मैच दे दो. किसे पता था कि उसे कुछ फर्क नही पड़ रहा. कितनों को विदाई देने वाला , सचिन को वर्ल्डकप दे कर भेजने वाला अचानक क्रिकेट छोड़ गया. बड़े खिलाड़ी होने की एक सबसे बड़ी खूबी होती है कि सब कुछ आप पीक पर ही छोड़ दें. पहले दादा और दूसरे धोनी. बीसीसीआई में अब तक कोई उसे हटाने का कारण नहीं खोज पा रहा था. और उसने आसानी से सब कुछ छोड़ दिया. लास्ट गेम में उसके नाम अर्धशतक है. इससे ज्यादा हम क्या कहें उसके बारे. शब्द आज नहीं निकल रहे. लग रहा क्रिकेट अब गैर हो गया. उसकी दाढी बढ़ने की खबर ट्विटर पर ट्रेंड होती है. और वो सन्यास इंस्टा पर बता के ले लेता है. कितना दूर भागोगे धोनी. हम तुमसे एक कॉन्फ्रेंस चाहते थे. हम चाहते थे तुम सन्यास की घोषणा करते हुए रोओ. जैसे हम तुम्हारे सन्यास की खबर पढ़ कर रोए हैं.

इंडियन जर्सी तुम्हे मिस करेगी. इंडियन फैन्स तुम्हें मिस करेंगे थाला. तुम भारतीय क्रिकेट का अमर नाम हो. तुम उम्मीद हो जो पूरी भी होती है. तुम भोर में देखे हुए एक सपने की तरहहो.
तुम्हे नहीं पता हमने क्रिकेट में अपना क्या खो दिया. हमने अपनी उम्मीदें खो दी माही. ग्राउंड पर विकेट के पीछे तुम्हारा न होना कितना दुःख देगा ये लिख पाना असंभव है.

नम्बर सात की जर्सी को अमर कर के जाने वाले तुम्हें अग्रिम और नई पारी की शुभकामनाएं.

✍️~Ds घुणावत~

Happy Father’s day

आज फादर्स डे है..तो मेरे को तो फेसबुक से पता चला तो सोचा कुछ अतीत को आपके समक्ष रखु ।।
हम लोग मिडिल क्लास हैं ना हमारे यहां पर पिताजी को गिफ्ट देकर सेल्फी पोस्ट करने का रिवाज नहीं है ना…
मिडिल क्लास फैमिली में लडका होने की सबसे बड़ी दिक्कत ये रहती है बाप और बेटे के बीच एक अंतर रहता है…बाप और बेटी तो दोस्त की तरह होते हैं लेकिन बाप और बेटे का रिश्ता कुछ सीमाओं में बंधा होता है..।


बाप..बेटे के लिए अपना प्यार खुल कर व्यक्त नहीं कर पाता और बेटा भी इसी द्वंद में पूरी जिंदगी निकाल देता है कि बाप से प्यार कैसे जताऊं!!
बेटा बाप की नजर में हमेशा काबिल रहता है चाहे वो कितना ही लीचड क्यों ना हो…और बाप तो खैर बेटे की नजर में हीरो है ही ।
.आप चाहे उन्हें पापा कहो, डैडी कहो या पिताजी कहो..बस उनके लिए हमेशा इज्जत बनी रहनी चाहिए.।


मेरे पिताजी गांव की परवरिश में पले बढ़े हैं..वो खुल के कह नहीं पाते कि उन्हें मुझसे कितना प्यार है…लेकिन मैं अब समझदार हो गया हूँ..उनकी चिंता और प्यार उनकी शक्ल देखकर ही समझ जाता हूँ..!!
.बचपन में वो साईकिल पर बिठाकर गाँव से दूर बाजार तक ले जाना ..गाँव में कंधे पर बिठाकर गर्व से घूमना और सबको ये बोलना ” मेरा बेटा है ” ताऊ  के साथ किक्रेट, सतोलिया, खेलना…हमारे फटे कपड़े को सिलना, व बटन लगाना ।..मेरे बीमार होने पर खुद खाना नहीं खाना…खुद फटे कुर्ते, बनियान के साथ एडजस्ट कर लेना ताकि मुझे कोई कमी नहीं हो!!
खुद की इच्छाओं को मार दिया ताकि मेरी ख्वाहिशें पूरी हो सकें….मेरी हर जायज जिद को पूरा करना ।।

मुझे दिखती हैं आपके माथे पर चिंता की लकीरें..मैं समझता हूँ मेरे फर्स्ट आने पर आपके चेहरे की खुशी….मैं अब सब समझता हूँ पिताजी…लेकिन कह नहीं पाता ठीक वैसे ही जैसे कि आप मुझसे बेहिसाब प्यार करते हैं मैं भी करता हूं!!

मैं आपको जिंदगी की सारी खुशियां देना चाहता हूँ पिताजी….और जरूर दूंगा ।
मेरे लडने का हौसला आप हो…मेरे जिंदगी की हर खुशी की वजह आप हो..।

(@Dsghunawat07): https://twitter.com/Dsghunawat07?s=09

हमारा बचपन

आजकल के बच्चे में समझ आते ही महंगी साइकिल, वाइकल की डिमांड कर देते हैं, एक हम हमारे बचपन में आत्मनिर्भरता पर भरोसा करते थे। क्योंकि ज्यादा जिद्द करने पर सब घर वाडो की मार झेलनी पड़ती थी  इसलिए खेल और मनोरंजन के लिए हम तार का बंगड़ (चकरा) और टूटी चप्पलों के टायर बना के गाड़ी बनाते थे ।
और जो लड़का बंगड़ को  बिना गिराए लंबी दूरी तक चलाता था  उसकी चर्चा पूरे गाँव के बच्चों में रहती थी
बंगड़ को मिट्टी में ऐसे  लहराते थे जैसे धूम फिल्म में जॉन और रितिक बाइक को लहराते हैं
और चप्पल के टायरों से जो गाड़ी बनाते थे ,साथ मे उसके पीछे ट्रॉली भी बनाते थे उनमें ऐसे असीम आंनद की अनुभूति प्राप्त होती थी मानो पूरा दुनिया की मौज हमे ही मिल रही हो।।



बंगड़ और टैक्टर ट्रॉली से हमे ऐसा फील होता था जैसे हम रॉयल एनफील्ड चला रहे हैं बंगड़ ऐसी पहली गाड़ी थी जिसकी चाबी खुद गाड़ी से बड़ी होती थी। हाथ का ग्रीफ अच्छा हो इसलिए चाबी के पीछे ढांचे  की लकड़ी या लंबे तार को फिट किया जाता था
कभी कबार यह बंगड़ और टैक्टर और ट्रॉली घरवालों से हमारी पिटाई भी करवा देता था  क्योंकि हम जोश-जोश में नई चप्पल भी काट देते थे
और खास बात  यह भी थी अगर किसी के पास स्टाइलिश बंगड़ और गाड़ी होती थी तो उसके भाव बढ़ जाते ।
हम बंगड़  के पीछे इतना दौड़ लेते थे कि फिर हमें कोई एक्सरसाइज करने की जरूरत ही नहीं पड़ती और फिट एंड फाइन रहते थे। मगर हर दिन आए नए साधन और संसाधनों ने वो बचपना लूट लिया, अब हर बच्चे के हाथ में मोबाइल है, करीब-करीब सबकी आंखें कमजोर हो गई है, ज्यादा मोबाइल के उपयोग से सब में चिड़चिड़ापन है, आज के बच्चों में 100 मीटर दौड़ने की

क्षमता नहीं रही…और भोजन में हमे सुबह के टाइम छाछ राबड़ी और शाम को दूध राबड़ी मिलती थी ,दोपहर के भोजन में कभी कभार सब्जी मिल जाती थी ,नही तो प्याज और रोटी से ही पेट भरते थे , और फल  फ्रूट का तो ऐसा है कभी रिस्तेदार घर आते या जीजी मामा के  से आती  थी तभी ही मिल पाते थे
कहने का मतलब है, देसी खेल, देसी संसाधन, देसी भोजन का कोई मुकाबला नही कर सकता था
✍️Ds घुणावत 

दादा जी के साथ बचपन

मेरे दादाजी मेरे जीवन के गाथक रहे है.और तीसरा पोता हु उनके हृदय के सबसे ज्यादा करीब रहा हूँ,,। वो अपने जीवन मे मुझे इतना स्नेह और प्रेम दिये है कि उसका माप या वर्णन करना मेरे बस की नही..। मेरे दादाजी के सबसे ख़ास बात ये थी जितना ज्यादा वो हमपे गुस्सा करते थे..।
उससे कई लाख गुना वो हमसे स्नेह करते थे…। ऐसा कह लो कि हम सब भाई बहिन उनके “जिगर के टुकडे” थे।। उनसे ही तो मैं सीखा हूँ.. घर के कर्तव्य और ज़िम्मेदारी  क्या होती है..। उनसे ही तो सीखा हूँ.. बुरे वक्त में अपनों को कैसे सम्भाल के रखना होता है। उनसे ही तो सीखा हूँ,
प्रेम और स्नेह का सागर में कैसे जीवन व्यतीत करना है,। मेरे दादाजी हमेसा से मेरे जीवन के प्रेरणार्थक और हौसलामंद इंसान रहे है,। और फिर मेरे दादाजी की उम्र ढ़लती गयी और आज वो  इस दुनिया मे नही है प्रकृति ने 2014 में उन्हें अपने घर बुला लिया ।।आज भी मेरे को किसी भी मेरे आसपास का अतीत का इतिहास जाने की जिज्ञासा होती है तो बहुत याद आते हो ।।

आप जहा भी हो ,आपको प्रकृति आपको हमेशा खुश रखे ।।

Miss you always 😢

दादा जी के साथ बचपन