मेरा गाँव

गाव का परिदृश् :- मेरा गाव जयसिंहपुरा पूर्वी राजस्थान के उत्तर-पूर्वी  दौसा में स्थित है  जिसके थोक के हिसाब से तीन ओर क्षेत्र के हिसाब से चार हिस्सो में बटा है! बालाजी की कोठी, जागवाला,सामला औऱ चोड्या  के साथ कड़ी कोठी  से 2km दक्षिण  में लगभग 150 घर की बस्ती अपने आप को चारो तरफ , घूमना, बुजोट और पाटन गाँव व उनकी  पहाड़ियों की वाल में समेटे हुए है! ओटड़ाओ को केंद्र बिंदु मान सकते है! प्रत्येक गाव के ठिडे बने होते है! जैसे मेरे गाव के बीच  में देवबाबा का ओटडा, भेरियाडा, चदाव,  न्याकुआ ,भेहणा का कुआ, ओर एक दो पुरानी जाग तिबारी भी है , गाव में घुणावत गोत के अलावा एक दो  घर जोरवाल भी है, ! हमारे गाँव में। जो सरकारी नोकरी नह लग्या  उनका  का मुख्य धंधा बल्ली फंटाओ का काम, माकान की छत डालबो है ! जिसे गाव की आर्थिक आधारशिला भी कह सकते है!

बस गाव का छरेट चोरी कोन कर बाकी सब ऐब आव, अब तो एकाध छरेट बड़ा बुढ़ान क खाणय नगरपालिका का भंगी की सी कटिंग भी राख मटा,  हर गाव की भांति हमारे गाव की भी राजनीति और समाजनीति दो धुर्वी है! हमारे आसपास के गाँवो की जनसंख्या के औसत के अनुसार , सरकारी नोकर हमारे गाँव मे ही ज्यादा थे अब  सरकारी कर्मचारी  जिनकी संख्या छोटे से गाँव मे  लगभग 60-70 के आसपास है!
गावो में खतों के नाम भी बड़े तर्क के साथ लिखे जाते है! जानोगे तो नाम के पीछे बहुत बड़ी गाथा होती है! हमारे गाव में इसप्रकार है! सेडवाडो,कुइवाडो, काचलो , क्यारो, डाबर, नराड़ी , इनाम , पाटी,बौराडो, दडा, बादड़ी, दो पौध न वाडो, अड़वाडो, मिडावाडो, बड़ाखेत, बड़ीकोठी, भाडेत,टिलाडो, बाकी तो अपने हिसाब से होते ही है! ..पढाई का मोहोल तो खूब है लेकिन लगभग आज की युवा पीढ़ी किसी न किसी रूप से  गैंगमेन से ऊपर कोषिष नही कर रही हैं

जिससे अपने। छोटे वालो को भी मोटिवेशन नही मिल पा रहा है, जो जहां लगा वही रह गया,लगभग सबकी पढाई गाँव के सरकारी स्कूल व पास में गीजगढ़ से हुई हैं और सबके कारनामे एक जैसे है! ,गाव के गिने चुने आदमी है जिनका गीजगढ़ या कड़ी कोठी जाए बिना दिन नही कटता, दो चार व्यक्ति गाव में ऐसे है जिनकी कैचिंग पावर के सामने कम्प्यूर फेल है! और कॉमेडी में बालीबुड का जोनिलिवर.जैसे-(संतोष बालाजी की कोठी,  बी.एल., शिवचरण (आन्दयो) इनके आगे सब फैल हैं
वैसे गाव में पुलिश केस लगभग और गाँवो की बजाए बहुत ही कम है।   जहा तक मेने अनुभव के तौर पर देखा है गाँव मे लगभग भाईचारा खत्म होता जा रहा है! , आप देश दुनिया के किसी भी कोने में रहो माई बाप, गाव ओर बोली को भुला नही सकते…..

गाव की सुविधा अनुसार एक घर नाई , दो घर लौहार, , 3-4 घर खुमार , 5-7 घर महावर , 2 घर बैरवा , 5-7 घर बामणों के , और 3-4  हरिजन भाइयो के है

✍️Ds ghunawat

…………………
   

Happy Father’s day

आज फादर्स डे है..तो मेरे को तो फेसबुक से पता चला तो सोचा कुछ अतीत को आपके समक्ष रखु ।।
हम लोग मिडिल क्लास हैं ना हमारे यहां पर पिताजी को गिफ्ट देकर सेल्फी पोस्ट करने का रिवाज नहीं है ना…
मिडिल क्लास फैमिली में लडका होने की सबसे बड़ी दिक्कत ये रहती है बाप और बेटे के बीच एक अंतर रहता है…बाप और बेटी तो दोस्त की तरह होते हैं लेकिन बाप और बेटे का रिश्ता कुछ सीमाओं में बंधा होता है..।


बाप..बेटे के लिए अपना प्यार खुल कर व्यक्त नहीं कर पाता और बेटा भी इसी द्वंद में पूरी जिंदगी निकाल देता है कि बाप से प्यार कैसे जताऊं!!
बेटा बाप की नजर में हमेशा काबिल रहता है चाहे वो कितना ही लीचड क्यों ना हो…और बाप तो खैर बेटे की नजर में हीरो है ही ।
.आप चाहे उन्हें पापा कहो, डैडी कहो या पिताजी कहो..बस उनके लिए हमेशा इज्जत बनी रहनी चाहिए.।


मेरे पिताजी गांव की परवरिश में पले बढ़े हैं..वो खुल के कह नहीं पाते कि उन्हें मुझसे कितना प्यार है…लेकिन मैं अब समझदार हो गया हूँ..उनकी चिंता और प्यार उनकी शक्ल देखकर ही समझ जाता हूँ..!!
.बचपन में वो साईकिल पर बिठाकर गाँव से दूर बाजार तक ले जाना ..गाँव में कंधे पर बिठाकर गर्व से घूमना और सबको ये बोलना ” मेरा बेटा है ” ताऊ  के साथ किक्रेट, सतोलिया, खेलना…हमारे फटे कपड़े को सिलना, व बटन लगाना ।..मेरे बीमार होने पर खुद खाना नहीं खाना…खुद फटे कुर्ते, बनियान के साथ एडजस्ट कर लेना ताकि मुझे कोई कमी नहीं हो!!
खुद की इच्छाओं को मार दिया ताकि मेरी ख्वाहिशें पूरी हो सकें….मेरी हर जायज जिद को पूरा करना ।।

मुझे दिखती हैं आपके माथे पर चिंता की लकीरें..मैं समझता हूँ मेरे फर्स्ट आने पर आपके चेहरे की खुशी….मैं अब सब समझता हूँ पिताजी…लेकिन कह नहीं पाता ठीक वैसे ही जैसे कि आप मुझसे बेहिसाब प्यार करते हैं मैं भी करता हूं!!

मैं आपको जिंदगी की सारी खुशियां देना चाहता हूँ पिताजी….और जरूर दूंगा ।
मेरे लडने का हौसला आप हो…मेरे जिंदगी की हर खुशी की वजह आप हो..।

(@Dsghunawat07): https://twitter.com/Dsghunawat07?s=09

हमारा बचपन

आजकल के बच्चे में समझ आते ही महंगी साइकिल, वाइकल की डिमांड कर देते हैं, एक हम हमारे बचपन में आत्मनिर्भरता पर भरोसा करते थे। क्योंकि ज्यादा जिद्द करने पर सब घर वाडो की मार झेलनी पड़ती थी  इसलिए खेल और मनोरंजन के लिए हम तार का बंगड़ (चकरा) और टूटी चप्पलों के टायर बना के गाड़ी बनाते थे ।
और जो लड़का बंगड़ को  बिना गिराए लंबी दूरी तक चलाता था  उसकी चर्चा पूरे गाँव के बच्चों में रहती थी
बंगड़ को मिट्टी में ऐसे  लहराते थे जैसे धूम फिल्म में जॉन और रितिक बाइक को लहराते हैं
और चप्पल के टायरों से जो गाड़ी बनाते थे ,साथ मे उसके पीछे ट्रॉली भी बनाते थे उनमें ऐसे असीम आंनद की अनुभूति प्राप्त होती थी मानो पूरा दुनिया की मौज हमे ही मिल रही हो।।



बंगड़ और टैक्टर ट्रॉली से हमे ऐसा फील होता था जैसे हम रॉयल एनफील्ड चला रहे हैं बंगड़ ऐसी पहली गाड़ी थी जिसकी चाबी खुद गाड़ी से बड़ी होती थी। हाथ का ग्रीफ अच्छा हो इसलिए चाबी के पीछे ढांचे  की लकड़ी या लंबे तार को फिट किया जाता था
कभी कबार यह बंगड़ और टैक्टर और ट्रॉली घरवालों से हमारी पिटाई भी करवा देता था  क्योंकि हम जोश-जोश में नई चप्पल भी काट देते थे
और खास बात  यह भी थी अगर किसी के पास स्टाइलिश बंगड़ और गाड़ी होती थी तो उसके भाव बढ़ जाते ।
हम बंगड़  के पीछे इतना दौड़ लेते थे कि फिर हमें कोई एक्सरसाइज करने की जरूरत ही नहीं पड़ती और फिट एंड फाइन रहते थे। मगर हर दिन आए नए साधन और संसाधनों ने वो बचपना लूट लिया, अब हर बच्चे के हाथ में मोबाइल है, करीब-करीब सबकी आंखें कमजोर हो गई है, ज्यादा मोबाइल के उपयोग से सब में चिड़चिड़ापन है, आज के बच्चों में 100 मीटर दौड़ने की

क्षमता नहीं रही…और भोजन में हमे सुबह के टाइम छाछ राबड़ी और शाम को दूध राबड़ी मिलती थी ,दोपहर के भोजन में कभी कभार सब्जी मिल जाती थी ,नही तो प्याज और रोटी से ही पेट भरते थे , और फल  फ्रूट का तो ऐसा है कभी रिस्तेदार घर आते या जीजी मामा के  से आती  थी तभी ही मिल पाते थे
कहने का मतलब है, देसी खेल, देसी संसाधन, देसी भोजन का कोई मुकाबला नही कर सकता था
✍️Ds घुणावत 

रामगढ़ बांध

दिल्ली में 1982 में एशियाई खेलों में नौकायन प्रतियोगिता जयपुर के भव्य कहे जाने वाले रामगढ़ बांध में आयोजित हुई थी। यह कल्पना कितनी खतरनाक और भयावह है कि उस प्रतियोगिता में भाग लेने वाले देश-विदेश के नौकायन प्रतियोगी यदि अब इस बांध को देखें तो उन्हें अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं होगा कि जिस लबालब भरे बांध मे उन्होंने अपनी नौकाएं दौड़ाई थीं, अब वहां केवल जंगली झाडियां ही दूर तलक तक दिखाई पड़ती हैं।

तीस लाख की आबादी को पानी पहुंचाने वाला एक बांध देखते ही देखते एक विराने में तब्दील हो गया। राजस्थान में जल संचय करने का यह एक बेजोड़ उदाहरण था। जिसे लगभग सवा सौ साल पहले बनवाया गया था। जोधपुर से रामगढ़ बांध देखने आए अधेड़ महेंद्र सिंह कहते हैं कि क्या इसी का लेकर मेरे रिश्तेदार इतना इतराते थे कि जितना बड़ा तुम्हारा शहर नहीं है, उससे बड़ा तो हमारा रामगढ़ बांध है।

वह कहते हैं कि मुझे जवानी में तो यहां आने का मौका नहीं मिला और जब ढलती उम्र में यहां आया हूं तो यह भी बांध पूरी तरह से खत्म हो चुका है। सहसा एक नजर में यह विश्वास करना बहुत कठिन है कि यह वही बांध है जहां से पूरे जयपुरवासी अपनी प्यास बुझाते थे।

रामगढ़ बांध के पास रहने वाला एक आदमी बताता हैं कि एक समय हमारी आजीविका का साधन ही यह दुकान थी, अब तो इस दुकान के दम पर मेरे जैसे अधेड़ का भी पेट नहीं भरता। कारण है कि अब तो यहां कोई आता-जाता ही नहीं है। बस सड़क है तो इस पर आने जाने इक्का दुक्का राहगीर कभी-कभार रूक कर कुछ खरीददारी कर लेते हैं।

सचमुच में यह बांध अब वीराने में सिमट कर रह गया है। दूर-दूर तक सन्नाटा पसरा हुआ है। इस सन्नाटे को टूटे-फूटे पानी स्प्लाई करने वाले कार्यालय के टीन शेड पर इधर-उधर उछल कूद करने वाले बंदर की धमक अवश्य इसे यदाकदा तोड़ती है। अन्यथा यहां बांध अपने बीते सुनहरे कल की बस यादें ही समेटे हुए है। बांध की जंग लगी पाइप लाइनें हों या बंद पड़े मोटर के हैंडल या यहां-वहां दूर तक गिरीपड़ी बांध की दीवारें हों। यह बांध के खत्म होने की कहानी बयां कर रहा है। हालांकि इसके बावजूद बांध की दीवारों पर बने गुंबद अब भी शान से खड़े हैं और भूले-भटके आने वालों को अपने भव्य अतीत को दर्शा रहा है।

जयपुर घूमने आने वाले बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक सवा सौ साल पुराने इस परंपरागत बांध को अवश्य देखने आते थे। राजस्थान में जल संचय करने की परंपरा की एक लंबी फेहरिस्त है। उसमें सूची में यह बांध भी शामिल था। लेकिन जयपुर शहर के महानगर में बदलते ही इस बांध के कैचमेंट क्षेत्र की जमीनों पर लोगों द्वारा कब्जा करना शुरू कर दिया। यह कब्जा इतना अधिक हो गया है कि इस बांध में चार नदियों से आने वाला पानी ही बंद हो गया।

अतिक्रमणकारियों ने कुछ इस प्रकार से कब्जा किया कि इस बांध का जल स्त्रोत को ही रोक दिया। और नतीजा सामने है एक सूनसान पड़ी खाली जगह। दूर-दूर तक बस जंगली झाडियां ही दिखाई पड़ रही हैं। कहीं दूर तलक भी पानी की एक झलक तक नहीं दिखाई दे रही है। राजस्थान की राजधानी जयुपर से लगभग 32 किलोमीटर दूर स्थित रामगढ़ बांध में अब पिछले एक डेढ़ दशक से कोई पर्यटक नहीं जाता है।

इस संबंध में जयपुर में विदेशी पर्यटकों को पिछले पांच सालों से राजस्थान की सैर कराने वाले टैक्सी ड्राइवर अखिलेश बताते हैं कि अब भी हर विदेशी की घूमने वाली जगहों में एक जगह निश्चित ही रामगढ़ बांध होती है। लेकिन हम ही उन्हें बता देते हैं कि अब वहां कुछ नहीं है। यह बांध 15.5 वर्ग किलोमीर में फैला हुआ है। एशियाई खेलों के आयोजन के 39 साल बाद इस बांध में पानी का एक बूंद नहीं है।

जयपुर  से सटे रामगढ़ बांध का गुबंद। फोटो: महेंद्र कुमार

चालीस सालों में सवा सौ साल पुराना बांध खत्म हो गया। उसे जमीन खा गई या आसमान खा गया, अब यह यक्ष प्रश्न नहीं है क्यों कि इस प्रश्न का जवाब हर जयपुरवासी और सरकार के पास है। पूरे बांध पर अतिक्रमणकारियों का कब्जा हो चुका। इस कब्जे को न तो अब तक सरकार हटा पाई है और न हीं अदालत। 

✍️Ds ghunawat

रेगिस्तान का जहाज

मानो ऊंट यू कह रहा हो कि हे मानव रेगिस्तान की धरा पर मैंने हर विकट परिस्थिति में तेरा साथ दिया पानी की सप्लाई, आवागमन का साधन ,हल जोतना, मनोरंजन, सवारी, दूध ,तथा पानी की समस्या को देखते हुए सात सात दिन बिन पानी के भी मैंने तेरा साथ दिया
हे मानव अब तुम्हे मेरी जरूरत नहीं रही तो मुझे दर-दर भटकने के लिए घर से निकाल दिया मै तुझ बिन कैसे जिऊंगा मेरी पीढी ही समाप्त हो जाएगी।।
आगे भविष्य में तुम्हारी अगली पीढ़ी को में चिड़ियाघर में नजर आऊंगा ।।
ऊंट, आंखों में आँसुओ के साथ है मानो बोल रहा है कि विदा बच्चे मैं जा रहा हूँ ।।
जोहार 🌱🌾

बैलगाड़ी

आज से लगभग 40या 50साल पहले ऊंट गाड़ी का चलन प्रारंभ हुआ  था , तो उससे पहले  हमारे गाँवो में आवागमन व आदिकिसान के लिए कृषि कार्य के लिए एक मात्र साधन बैलगाड़ी हुआ करता था
बैलगाड़ी से जुड़ी हुई कहानियां और कहावते हमारे जनमानस में समाई हुई है लेकिन प्रत्यक्ष रूप से बहुत ही
कम भाइयो ने देखी होगी , सवारी तो खैर दूर की बात ?
बैलगाड़ी वाला दौर तो लगभग आज से लगभग 25 साल पहले  ही खत्म हो  गया ,,लेकिन अब तो ऊँट गाड़ी वाला दौर भी खत्म है
आज भले ही मानव ने बहुत विकास किया है, और एक से एक बेहतरीन तथा तेज चाल वाली गाड़ियाँ आदि बनाई हैं, लेकिन बैलगाड़ी के महत्त्व को नहीं नकारा जा सकता। प्राचीन भारतीय परिवहन की रीढ़  रही
वर्तमान समय में भले ही मानव तेजी से विकास पथ पर अग्रसर है, जो काबिल-ए-तारीफ़ भी है, पर सृष्टि के गूढ़ रहस्यों की खोज में हम कहीं न कहीं अपनी प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं हमने पुरी तरह भारतीय परिवहन व्यवस्था की रीढ़ रही बैलगाड़ी को लगभग खो दिया है। आज जो भी मनुष्य पचास से अधिक वर्ष के हैं, वे जानते हैं कि बैलगाड़ी हांकना और घोड़े की लगाम थामने में वही अन्तर था, जो आज कार व बस को चलाने में है। यही नहीं चूंकि उनके अन्दर भी आत्मा थी।।
जोहार 
✍️Ds घुनावत

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माँ😘

हो जाऊं कितना भी ऊंचा

पर मां के चरणों की रज हूं ।।

दुनिया मुझको कुछ भी माने

मै तो मां का सूरज हूं।।

कभी भानु कह देती कुल का कभी लाल कह देती है ।

कभी बीठाती गोद में अपनी

और निहाल कर देती है

मां के स्नेह सरोवर का ।।

मै एक प्यारा सा पंकज हूंमै तो मां का सूरज हूं।।

✍️Dsghunawat

जोहार प्रकृति माँ🌱🌾

प्रकृति टूटी हुई चीज़ों का इस्तेमाल बड़ी खूबसूरती से करता है, बादल  के टूटने पर पानी बरसता है, मिट्टी टूटने पर खेत बनता है और बीज के टूटने पर नए पौधे की संरचना होती है। इसलिए जब आप खुद को टूटा हुआ महसूस करो तो समझ लीजिये प्रकृति आपका इस्तेमाल किसी बड़ी उपियोगिता के लिए करना चाहती है जोहार प्रकृति माँ 🌾🌱

माँ के संग बचपन

मन करता है लौट चलें गांव

की ओर छोटी सी पगडंडी से

खुले खुले खेतों में। तोड़ लू कुछ हरे हरे पत्ते

पीले पीले फूल ।फिर  प्यारा सा गुलदस्ता बना लू सीधे काका, ताऊ के हाथों में थमाऊ,और कह दू, क्या खूब सजाया है धरा को मन करता है

उस बचपन में लौट जाऊं जहां मिलती थी गाँव की महिलाएं,  ग्राम बालाएं।

घर से कुएँ तक झुण्ड में। माथे पे, किसी के हाथ में ,बासण हुआ करते थे।

वो डगर सुहानी लगती थी जब मै जीजी के पीछे पीछे चलता था मन करता है ….लौट चले गाँव की औऱ

✍️Dsghunawat
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में मेरी माँ की आत्मकथा हु

बूढ़ी हो चली माँ..अक्सर अपनी चीजें और बातें भूल जाती है..पर, उसे आज भी याद है..
मेरा रोना, हँसना..मेरा घुटनों पे चलनामेरी तोतली बातें..मेरे चोटों के निशान के पीछे की कहानी..मेरी सारी शरारतें..वो मुझे आज भी सबकुछ बताती है..माँ, मुझे आज भी मेरा बचपन  दिखाती है ✍️Dsghunawat

✍️Dsghunawat

8741980870

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